आत्मज्ञान की प्राप्ति-जिसको आत्मज्ञान नहीं है उसके लिए मनुष्य जीवन व्यर्थ हैं

आत्म ज्ञान हो जाने पर मनुष्य आवागमन रूपी भवसागर से सीध्र ही पार हो जाता है


प्रथम तो जीव नर जन्म मिलता कठिन है! नर जन्म मिलने पर भी जिसे प्रभु प्रेम में कुछ मति नहीं, वह नर नहीं वह मूढ़ है जिसको ना अपना ज्ञान है! नर जनन का वह कर रहा अरु जाती का अपमान है.
ब्रह्म निष्ठा का महत्व

ब्रह्म निष्ठा का महत्व

जीवो को प्रथम तो मनुष्य जन्म मिलना ही कठिन है !84 लाख योनियों का भोग कर तब मनुष्य जन्म मिलता है! अंतः मनुष्य जन्म मिलने पर भी जिस प्राणी को प्रभु के चरण कमलों में प्रेम नहीं हैं. वह मनुष्य नहीं, वह मूढ़ धर्मी है जिसको "आत्मज्ञान" नहीं है, वह मनुष्य जन्म का और अपनी जाती का अपमान कर रहा है.

दुर्लभ मनुष्य देह और उसमें भी पुरूषत्व को पाकर जो स्वार्थ साधन में प्रमाद करता है! उससे अधिक मूढ़ कौन होगा चाहे वह मनुष्य संपूर्ण शास्त्रों का यथा विधि अध्ययन कर ले और नित्यप्रति देवताओं का भजन भी करे और भी अनेक शुभ कार्य करें जब तक ब्रह्म और आत्मा की एकता का बोझ नहीं होता. तब तक सौ कल्पों के बीत जाने पर भी मुक्ति नहीं हो सकती.

इसलिए विचक्षण पुरुष ब्रह्मा भोगों की इच्छा न करता हुआ सन्त शिरोमणि गुरुदेव की शरण में जाकर उसके उपदेश किए हुए विषय में समाहित होकर मुक्ति के लिए प्रयत्न करें, क्योंकि गुरु के बिना ज्ञान होना कठिन है और ज्ञान के बिना "आत्मा विवेक" नहीं हो सकता.

जिसको आत्म ज्ञान नहीं है उसके लिए मनुष्य जीवन व्यर्थ है 


चाहे वह और शास्त्रों में पुराणों में किताना ही परिश्रम करें जैसे नीति में कहां भी हैं.

पठन्ति चतुरोवेदाम् धर्मशास्त्रांन्यनेकश: !
आत्मानं नैव जानंति दवांषाय सरस यथा !!

चाय वे चारों वेदों को पढ़ ले और अनेक शास्त्रों को पढ़ ले यदि वह अपनी आत्मा को नहीं पहचानता है जिस तरह करछी सब व्यंजन में फिरती है लेकिन स्वाद नहीं पहचानती है.

आत्मज्ञान हो जाने पर मनुष्य इस आवागमन रुपी भवसागर से सीधे ही पार हो जाता है! उसे संसार से फिर ममता नहीं रहती जैसे कहां भी हैं.

आत्म ज्ञान ही स्वर्ग तृण है जित इन्दिय तृण नारी, शूरही तृण है जीवणे, निस्पृह तृण संसार ! 

आत्मज्ञानी को स्वर्ग तृण के समान है सूरवीर के लिए जीवन तृण के समान है. और जिसने इंद्रियों को वश में कर लिया है, उसके लिए स्त्री तृण के समान है. और आत्म ज्ञान के द्वारा जो इच्छारहित हो गया है, उसके लिए यह संसार तृण के समान है.

अंतः "आत्मज्ञान" में तत्पर हुए विचक्षण को चाहिए कि वह संपूर्ण कर्मों का त्याग कर भव बंधन की निवृत्ति के लिए प्रयत्न करें.

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